बनारस घराना (Benares), जिसे जानकीप्रसाद घराना (Jankiprasad) भी कहते हैं, कथक नृत्य का घराना है। इसका नाम वाराणसी से आया है, जहाँ परंपरा के अपने विवरण के अनुसार इसके संस्थापक 19वीं सदी के आरंभ में आ बसे थे। अधिकतर सूचियाँ इसे जयपुर और लखनऊ के साथ कथक के प्रमुख घरानों में गिनती हैं। बनारस तबला घराना भी इसी शहर के नाम पर है, पर वह अलग परंपरा है। मार्गरेट वॉकर के 2010 के अध्ययन को 1920 या 1930 के दशक से पहले का ऐसा कोई ग्रंथ या यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता जो कथक नाम के किसी नृत्य का उल्लेख करे, फिर भी वे बनारस की 1832 की एक जनगणना का हवाला देती हैं, जिसमें कथक समुदाय के 118 लोग संगीत और नृत्य के शिक्षकों के रूप में दर्ज थे।

विभिन्न विवरण जानकीप्रसाद को संस्थापक मानते हैं और उनका मूल राजस्थान के बीकानेर में बताते हैं। परंपरा की अपनी संस्था नटवरी उनकी कोई तिथि नहीं देती। घराने की किंवदंती कहती है कि बीकानेर की महारानी ने उन्हें बचपन में पानी पर तैरते एक तख़्ते पर नाचते देखा था, और नटवरी जोड़ती है कि महारानी उनकी संरक्षक बनीं। इसी विवरण के अनुसार वे कथक को उसकी भक्ति की जड़ों के निकट लाने के लिए बनारस आए। जायसवाल और उपाध्याय का 2023 का एक शोध-पत्र सुखदेव महाराज को दूसरा संस्थापक बताता है, जबकि नटवरी की वंशावली में उनका नाम नहीं है।

नटवरी के अनुसार जानकीप्रसाद के समय का नृत्य तबले और ढोलनुमा पखावज के लिए बनी रचनाओं पर टिका था, और उन्होंने नृत्य के अपने अक्षर रचे, जिन्हें नटवरी (natawari) बोल कहते हैं। इनके उदाहरण, जैसे झुंग और चेका, तबले पर नहीं बजते, और नटवरी का अभिलेखागार इनमें से कई बोल बाद के गुरु बिहारीलाल के नाम दर्ज करता है। नटवरी पर उपलब्ध एक वक्तव्य के अनुसार, कुमुदिनी लाखिया की नज़र में इस घराने के बोल जयपुर और लखनऊ के बोलों से अलग हैं। नटवरी बारह रचनाओं की शृंखला बारहखड़ी का श्रेय भी जानकीप्रसाद को देती है, और इस घराने की गति को गीतात्मक और सहज प्रवाह वाली बताती है।

बाद के तीन गुरुओं, हनुमान प्रसाद, बिहारीलाल और गोपालजी, ने यह शैली उत्तर भारत में फैलाई। गोपालजी लाहौर में बस गए, और लोग कभी-कभी इस घराने को लाहौर, पंजाब या गोपालजी का घराना भी कहते थे। उनके शिष्य आशिक हुसैन, जो नर्तक और फ़िल्म अभिनेता थे, 1949 में पाकिस्तान चले गए और यह परंपरा हजारीलाल को सौंप गए, जिन्होंने मंच पर इसे फिर से जीवित किया। हजारीलाल और उनकी शिष्या और पत्नी सुनयना हजारीलाल की संस्था नटवरी आज सुनयना को इस धारा की अगुआ बताती है। दूसरी धारा सुखदेव महाराज के परिवार से होकर चलती है, जिन्होंने अपनी बेटी सितारा देवी को सिखाया। सितारा देवी ने लखनऊ के गुरुओं से भी सीखा, और समीक्षक विजय शंकर को उनके नृत्य में दोनों घरानों की झलक दिखती है। स्क्रॉल के शोक-लेख ने उन्हें इस घराने की सबसे ओजस्वी प्रतिनिधियों में गिना।

प्रमुख कलाकार

  • जानकीप्रसाद, संस्थापक माने जाते हैं, घराने के अपने विवरण के अनुसार 19वीं सदी का आरंभ
  • हनुमान प्रसाद, कश्मीर, पटियाला और बीकानेर के दरबारी नर्तक, बाद में दिल्ली में शिक्षक (1872 से 1952)
  • बिहारीलाल, इंदौर के दरबारी नर्तक और गायन कलाकार केसरबाई केरकर के गुरु (1864 से 1938)
  • गोपालजी, गुरु जो यह शैली लाहौर ले गए (निधन 1932)
  • हजारीलाल, गुरु जिन्होंने जानकीप्रसाद धारा को फिर से जीवित किया (निधन 1992)
  • सुनयना हजारीलाल, नटवरी के अनुसार जानकीप्रसाद धारा की अग्रणी कलाकार, कथक के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार 2003
  • सुखदेव महाराज, बनारस की दूसरी धारा के प्रमुख, जायसवाल और उपाध्याय (2023) के अनुसार सह-संस्थापक
  • सितारा देवी, नर्तकी, सुखदेव महाराज की बेटी और शिष्या (1920 से 2014)

स्रोत

  • Margaret Walker, Revival and Reinvention in India's Kathak Dance, MUSICultures 37 (2010)
  • Jaiswal और Upadhyay, The Banaras Gharana of Kathak Dance: A Study from the Past to Present, ShodhKosh Journal of Visual and Performing Arts (2023)
  • Natawari, जानकीप्रसाद घराने के इतिहास, अभिलेखागार और शैली पृष्ठ
  • Vijay Shanker, About Sitara Devi, the Queen of Kathak, Bhavan's Journal (2022)
  • Scroll.in, सितारा देवी पर शोक-लेख (2014)
  • Sangeet Natak Akademi, सुनयना हजारीलाल का पुरस्कार परिचय