About देबादित्य चक्रवर्ती
देबादित्य चक्रवर्ती सेनिया-मैहर घराने की परम्परा से जुड़े एक सिद्धहस्त सितार वादक हैं। हिन्दुस्तानी वाद्य संगीत की इस गहरी वंश-परम्परा में उनका प्रवेश पिता पं. देबासिस चक्रवर्ती से हुआ, जो शास्त्रीय गिटार के प्रख्यात वादक और शिक्षक हैं। बाद में उनकी शिक्षा प्रो. लव्ली शर्मा और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सितार व ज़िटार वादक श्री निलाद्री कुमार के सान्निध्य में आगे बढ़ी। स्व. पं. ब्रिज भूषण काबरा, स्व. पद्मश्री पं. भजन सोपोरी और श्री आलम ख़ान जैसे गुरुओं का मार्गदर्शन भी उन्हें मिला, जिससे उनकी संगीत-यात्रा का फ़लक विस्तृत हुआ।
देबादित्य की शैली परम्परा और समकालीन अभिव्यक्ति का प्राकृतिक मेल है। उनके वादन में गायकी और तन्त्रकारी अंग सहजता से एकाकार होते हैं, जिनमें सुरबहार और वीणा की तकनीकों की साँसें भी सुनाई देती हैं। चॉर्डल और हार्मोनिक प्रयोग उनके संगीत को नई गहराई देते हैं। लयकारी पर उनका पकड़ और स्वर-विस्तार की स्पष्टता मञ्च पर एक संवेदनशील ऊर्जा रचती है और श्रोता राग की गहराई में दाख़िल हो जाते हैं।
शिक्षा की दृष्टि से भी देबादित्य का मार्ग असाधारण रहा है। वनस्पति विज्ञान में बी.एससी., सितार में एम.ए., उच्च शोध-कार्य, संगीत प्रभाकर और संगीत विशारद जैसी उपाधियाँ उनकी कला और विद्वत्ता दोनों के प्रति समर्पण को दर्शाती हैं।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी की संगीत प्रतियोगिता में तीन बार विजेता बनने का गौरव प्राप्त है। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने के साथ-साथ संस्कृति मंत्रालय सहित कई राष्ट्रीय छात्रवृत्तियाँ भी उन्हें मिल चुकी हैं। ताज महोत्सव, देशभर की विश्वविद्यालय कॉन्सर्ट श्रृंखलाएँ और फ़्रेस्नो स्टेट, कैलिफ़ोर्निया में Celestial Synergy जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उनकी वादन-यात्रा छाप छोड़ चुकी है।
वर्ष 2023 में देबादित्य ने कलासुधा के पूर्वी महोत्सव में अपनी प्रस्तुति दी, जो उनकी वैश्विक पहचान का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। पूर्वी फेस्टिवल की लाइव EP सहित उनकी हालिया रिकॉर्डिंग इस बात की साक्षी हैं कि परम्परा और आज के श्रोताओं के बीच उनका संगीत एक जीवंत संवाद रच रहा है।
मंच से इतर देबादित्य एक समर्पित शिक्षक और मार्गदर्शक भी हैं। मुंबई में फैकल्टी मेंटर के रूप में कार्यरत रहकर उन्होंने कई छात्रों को शास्त्रीय संगीत की गहराई से रुबरू कराया है। उनका कला-दर्शन सतत शोध, प्रस्तुति और सहयोग पर केन्द्रित है, जो सितार की अभिव्यंजनाओं को विस्तार देता है और उस वंश-परम्परा के प्रति उनकी निष्ठा को भी जीवित रखता है जिसने उन्हें गढ़ा है।