मूल श्रेणी कर्नाटक शास्त्रीय
कर्नाटक वाद्य संगीत वीणा, वायलिन, बांसुरी और मृदंगम पर बजने वाला दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत है। वाद्य वादक गायकों वाले ही गीत गायन शैली में बजाते हैं।
ऐतिहासिक समयरेखा
मुखचंग यूरेशिया के ज़्यादातर हिस्से में और दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में बजते हैं। ग्रिनेल कॉलेज का संग्रह व्युत्पत्ति के ऐसे साक्ष्य बताता है कि यह वाद्य उत्तर-पश्चिम से उपमहाद्वीप पहुँचा। कुर्ट जाक्स का हवाला देते हुए यह भारत को पश्चिम एशियाई और पूर्व एशियाई मुखचंगों की सीमा पर रखता है, और मोर्सिंग के रूप और संगीत-संदर्भ को पश्चिम एशियाई परंपराओं से जोड़ता है। विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के भारतीय संग्रहों में लोहे के मुखचंग हैं: एक अवध का दर्ज है, और एक मोचंग 1890 में सौरींद्र मोहन टैगोर ने भेंट किया। किसी पर बनने की तारीख़ नहीं है।
श्रुति पत्रिका एक परंपरा का विस्तार से सूत्र खोजती है। बैंगलोर के एल. भीमाचार (1931 से 2024) ने आकाशवाणी के कलाकारों मद्रास आर. वी. पक्किरिसामी और पुदुक्कोट्टै महादेवन को सुनकर अपना मोर्सिंग वादन निखारा। उन्होंने अपनी बानी विकसित की, यानी वादन की एक शैली या संप्रदाय, जो मोर्सिंग के अनुकूल ताल-बोलों पर ज़ोर देती है, जबकि ज़्यादातर वादक मृदंगम के बोल ज़ोर लगाकर बोलते थे। उनकी संतानें बी. राजशेखर और भाग्यलक्ष्मी एम. कृष्ण वरिष्ठ मोर्सिंग कलाकार हैं, और 2009 में आकाशवाणी ने कर्नाटक के किसी मोर्सिंग वादक को पहली बार ए ग्रेड दिया, जो राजशेखर को मिला।
चीन में हड्डी के शुरुआती मुखचंग
मुखचंग परिवार कम से कम 4,000 साल पुराना है। 2018 में पुरातत्वविदों ने शानशी के शिमाओ से उतने ही पुराने हड्डी के 20 से ज़्यादा मुखचंगों की घोषणा की, जिन्हें शिन्हुआ ने चीन में मिले सबसे पुराने तार-वाद्य बताया।
कर्नाटक संगीत-सभाओं में प्रवेश
श्रुति पत्रिका कर्नाटक संगीत-सभाओं में मोर्सिंग के आने की संभावित तिथि 1900 के दशक की शुरुआत बताती है। वहाँ यह मृदंगम और दूसरे ताल-वाद्यों के साथ ताल, यानी लय-चक्र, थामने लगा।
एल. भीमाचार और आकाशवाणी
बैंगलोर के एल. भीमाचार गायन संगीत और मृदंगम सीखने के बाद 1940 के दशक की शुरुआत में मोर्सिंग अपनाते हैं। 1979 में आकाशवाणी बैंगलोर मोर्सिंग कलाकार का एक पद खोलती है और उन्हें इस पद पर पहले कलाकार के रूप में नियुक्त करती है।
मोरचिंग तरंग और राष्ट्रीय पुरस्कार
2006 में भीमाचार परिवार अपना मोरचिंग तरंग एम्स्टर्डम के एक मुखचंग उत्सव में ले जाता है। आकाशवाणी चेन्नई के शीर्ष ग्रेड कलाकार ए.एस. कृष्णन को मोर्सिंग पर कर्नाटक वाद्य संगीत के लिए 2024 का संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिलता है।
वादन तकनीकें
मुँह और साँस
वादक का मुँह और साँस तय करते हैं कि मोर्सिंग की ध्वनि के कौन से हिस्से सुनाई दें। छेड़ी गई जीभ एक मूल स्वर और उसके ऊपर ऊँचे स्वरों की एक शृंखला, यानी हार्मोनिक्स, देती है। अलग-अलग स्वर-ध्वनियाँ बनाने जैसे आकार में ढलकर मुँह एक अनुनादक बन जाता है, जो एक बार में एक हार्मोनिक को उभारता है। ग्रिनेल के अनुसार बजाते हुए साँस छोड़ने से सुषिर वाद्य जैसा गुण जुड़ता है।
जीभ और सुर-मिलान
मोर्सिंग का घेरा घोड़े की नाल के आकार का होता है, जिसकी दो सीधी भुजाएँ होती हैं। धातु की एक जीभ, या लैमेला, गोल सिरे से जुड़ी होती है और भुजाओं के बीच चलती है। इसका खुला सिरा ऊपर मुड़कर ट्रिगर बनाता है, जिस पर वादक प्रहार करते हैं। वादक एकल कलाकार की श्रुति, यानी संदर्भ स्वर, से मेल खाता मोर्सिंग चुनते हैं; श्रुति पत्रिका बताती है कि इस वाद्य को थोड़े अलग स्वरमानों पर मिलाया जा सकता है।
स्वरमान और धुन
ग्रिनेल के अनुसार एक मोर्सिंग का मूल स्वर तय रहता है; मुँह और जीभ उसके अधिस्वर और ध्वनि-रंगत बदलते हैं। मोर्सिंग को धुन के वाद्य की तरह इस्तेमाल करने के लिए एल. भीमाचार की संतानों ने मोरचिंग तरंग रचा, यानी कई मोर्सिंगों के लिए एक रचना, जिनमें से हर एक किसी एक राग (स्वर-ढाँचे) के अलग स्वर पर मिला होता है। उन्होंने जुलाई 2006 में एम्स्टर्डम के पाँचवें अंतरराष्ट्रीय ज्यूज़ हार्प उत्सव में इसे 30 मिनट तक बजाया।
महारत की यात्रा
इस विधा में महारत के लिए इस सुनियोजित यात्रा का पालन करें
पकड़ और छेड़
साँस और मुँह का आकार
मृदंगम के बोल और ताल
मृदंगम की छाया में
तनी आवर्तनम
पिछली प्रस्तुतियाँ
प्रमुख कलाकार
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