मूल श्रेणी कर्नाटक शास्त्रीय
कर्नाटक वाद्य संगीत वीणा, वायलिन, बांसुरी और मृदंगम पर बजने वाला दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत है। वाद्य वादक गायकों वाले ही गीत गायन शैली में बजाते हैं।
ऐतिहासिक समयरेखा
संस्कृत साहित्य इस ड्रम को मृदंग के नाम से जानता है। यह शब्द महाभारत में आता है, और नाट्य और संगीत का प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र इसे प्रमुख ड्रमों में गिनता है। लेखक इस नाम को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं। नाट्यशास्त्र इसे मृत्, यानी मिट्टी, से जोड़ता है, जो शुरुआती ड्रमों की सामग्री थी। मोनियर-विलियम्स के अनुसार यह संभवतः मृदम् और ग से बना है, यानी "पीटे जाते हुए घूमना", और आप्टे के अनुसार धातु मृद्, यानी "पीटा जाना", से। बाद के ड्रम लकड़ी के बनने लगे। भौतिकशास्त्री सी. वी. रमन ने ध्यान दिलाया कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथ मृदंग का उल्लेख करते हैं और अजंता की गुफा-चित्रकला में यह दिखता है।
हिंदू कथा कहती है कि नंदी ने शिव के नृत्य तांडव के लिए यह ड्रम बजाया, और इसे देव वाद्यम, यानी दिव्य वाद्य, कहती है; गणेश को अक्सर इसके साथ दिखाया जाता है। इसके उत्तरी संबंधियों के बारे में विवरण अलग-अलग हैं। दरबार ट्रस्ट के लिए जमीला सिद्दीकी के लेखन में मृदंगम पखावज का मूल रूप है, और रमन ने तबला को मृदंग का आधुनिक रूप कहा।
नाट्यशास्त्र
नाट्यशास्त्र मृदंग को अपने प्रमुख ड्रमों, पुष्करों, में गिनता है और ऐसे आकारों का वर्णन करता है जिनकी तुलना हरड़ के फल, जौ के दाने और गाय की पूँछ से होती है। रमन ने ध्यान दिलाया कि यह ड्रम अजंता की गुफा-चित्रकला में भी दिखता है।
20वीं सदी के तीन सिद्धहस्त कलाकार
पालघाट मणि अय्यर (1912-1981) म्यूज़िक अकादमी का संगीत कलानिधि पाने वाले पहले मृदंगम वादक बनते हैं। उनके समकालीनों में पलनी सुब्रमणिया पिल्लै (1908-1962; कुछ स्रोत 1909 बताते हैं) और सी. एस. मुरुगभूपति (1914-1998) हैं।
बाद की पीढ़ियाँ
1960 के दशक में मणि अय्यर के सम्मान के बाद म्यूज़िक अकादमी और मृदंगम वादकों को संगीत कलानिधि देती है: 1994 में टी. के. मूर्ति को, मणि अय्यर के शिष्यों उमयालपुरम के. शिवरामन को 2001 में और पालघाट आर. रघु को 2007 में, और 2014 में टी. वी. गोपालकृष्णन को।
वादन तकनीकें
करणै (काला धब्बा)
करणै दाहिने हाथ वाले ऊँचे स्वर के मुँह पर लगा स्थायी काला धब्बा है। वह मुँह खाल की तीन परतों से बनता है। निर्माता बीच में एक परत छोड़कर बाक़ी सब काट देते हैं, जिससे किनारे पर छल्ले बचते हैं, फिर उस एक खाल पर परत-दर-परत धब्बा बनाते हैं और हर परत को पत्थर से घिसते हैं। यह बीच में सबसे मोटा होता है। रमन ने 1934 में दर्ज किया कि इस लेप में आयरन ऑक्साइड, कोयला, स्टार्च और गोंद होने की बात कही जाती थी; दरबार ट्रस्ट की जमीला सिद्दीकी के अनुसार इसमें उबले चावल, मैंगनीज़ का चूरा और पानी होता है।
1919 में शुरू हुए रमन के प्रयोगों ने दिखाया कि लेप चढ़ा मुँह अपने ऊँचे अधिस्वरों को दबाता है और अपने सबसे निचले नौ कंपन-रूपों को हार्मोनिक क्रम के पाँच स्वरों में समेट देता है, जिससे ड्रम एक निश्चित स्वर देता है। किनारे का चौड़ा छल्ला छोटा, दबा हुआ स्वर देता है और संकरा छल्ला लंबा, चमकीला स्वर। ड्रम को षड्ज पर मिलाने के लिए वादक घेरे या पट्टे पर, कभी-कभी लकड़ी की एक खूँटी के ज़रिए, चोट करते हैं।
बाएँ मुँह का लेप (तोप्पि)
बाएँ हाथ वाले बड़े बास वाले मुँह पर कोई स्थायी धब्बा नहीं होता। हर प्रस्तुति से पहले मृदंगम वादक इसके बीच में गुँधे आटे की ताज़ा, गीली लोई दबाते हैं, जिससे स्वर नीचा होता है और बास गहरा होता है। 1934 में लिखते हुए रमन ने इस लोई को गूँधा हुआ गेहूँ का आटा बताया।
सोल्लुकट्टु और कोन्नक्कोल
सोल्लुकट्टु कर्नाटक लय के बोले जाने वाले ड्रम-बोल हैं; ताल-वाद्य वादक त्रिची शंकरन की व्याख्या में सोल का अर्थ अक्षर है और कट्टु का समूह; और कोन्नक्कोल उन्हें बोलने की कला है।
एक पेशेवर कर्नाटक ताल-वाद्य वादक की रिकॉर्डिंगों से यूनिवर्सिटात पोम्पेउ फाब्रा के म्यूज़िक टेक्नोलॉजी ग्रुप का प्रकाशित एक शोध-डेटासेट मृदंगम के प्रहारों को दस वर्गों में बाँटता है: भीम, चा, धीम, धिन, नुम, ता, था, थाम, थि और थोम।
महारत की यात्रा
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बैठक और पहले प्रहार
लय को बोलना
ताल सीखना
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एकल प्रस्तुति
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