मूल श्रेणी हिंदुस्तानी शास्त्रीय
हिंदुस्तानी शास्त्रीय वाद्य संगीत उत्तर भारत का राग संगीत है, जो सितार, सरोद, सारंगी, बांसुरी और तबला जैसे वाद्यों पर बजता है, और हर वाद्य की अपनी तकनीक है।
ऐतिहासिक समयरेखा
उत्तर मुगल दरबार और अलवर जैसे रियासती दरबारों में बीनकार कहे जाने वाले वंशानुगत दरबारी संगीतकार रुद्र वीणा बजाते थे। इसके 20वीं सदी के वादकों में डागर घराने के जिया मोहिउद्दीन डागर थे, और असद अली खान, जिनका जन्म 1937 में अलवर में बीनकारों के परिवार में हुआ और जिनकी वादन शैली खंडारबानी थी। संगीत नाटक अकादेमी ने हिंदुस्तानी वाद्य संगीत का अपना पुरस्कार 1977 के लिए असद अली खान को और 1981 के लिए जिया मोहिउद्दीन डागर को दिया।
2021 में उनके बेटे बहाउद्दीन डागर ने लक्ष्मी आनंद को बताया कि जिया मोहिउद्दीन डागर ने 1963 में कलकत्ता में कन्हाई लाल के निताई बाबू के साथ एक नई वीणा बनाई, जिसमें सागौन की नली, बड़े तूँबे और धागे से बँधे नीचे परदे थे। इसका वज़न लगभग 3 kg से बढ़कर लगभग 10 kg हो गया, इसलिए वादक सरस्वती वीणा की तरह कंधा नीचे तूँबे तक लाते हैं।
पेरिस के एक संग्रहालय में 17वीं सदी की बीन
पेरिस का म्यूज़े द ला म्यूज़ीक अपनी बीन E.997.24.1 को 17वीं सदी का बताता है। संग्रहालय के अभिलेख के अनुसार यह राजस्थान में मिली, शायद बीकानेर से, और इसमें तेरह परदे और मुगल शैली से प्रेरित सजावट है।
मुगल दरबार के एक बीन वादक का चित्र
जेम्स स्किनर की 1825 की तशरीह अल-अक़वाम में आख़िरी मुगल बादशाहों के प्रमुख वंशानुगत बीन वादक मियाँ हिम्मत खान का एक चित्र है। कैथरीन बटलर स्कोफील्ड के 2023 के अध्ययन में इस चित्र की चर्चा है।
यूनेस्को के एक एल्बम पर असद अली खान
फिलिप ब्रुगिएर का रिकॉर्ड किया हुआ यूनेस्को कलेक्शन का एल्बम North India: Instrumental Music of Mediaeval India (Auvidis D 8205) असद अली खान को राग दरबारी कान्हड़ा और गुणकली बजाते हुए प्रस्तुत करता है, साथ में पखावज पर गोपाल दास हैं।
दरबार में ज्योति हेगड़े का राग पूर्वी
दरबार संस्था के संग्रह के अनुसार ज्योति हेगड़े ने 20 सितंबर 2014 को लंदन के साउथबैंक सेंटर में दरबार फ़ेस्टिवल में रुद्र वीणा पर राग पूर्वी बजाया, साथ में जोड़ी पर सुरदर्शन चाना और तानपुरे पर देबिप्रिया सरकार थे।
वादन तकनीकें
नली, तूँबे, परदे और घुड़च
ढाँचा एक लंबी खोखली नली है, डाँडी, जो बाँस या खोखली की गई लकड़ी की, अक्सर सागौन की, बनती है। नली पर ऊँचे परदे खड़े होते हैं, और उसके नीचे दो बड़े तूँबे के अनुनादक, तूँबा, लगे होते हैं। निचले सिरे पर खुदा हुआ मोर या हंस सपाट मुख्य घुड़च, यानी जवारी, थामता है, और खुदा हुआ एक सिर ऊपरी सिरे को बंद करता है।
परदों के विवरण अलग-अलग हैं। बहाउद्दीन डागर हल्की धातु से मढ़े लकड़ी के परदों का वर्णन करते हैं, जो मोम के एक ही उभार पर टिके होते हैं। फिलिप ब्रुगिएर के वर्णन में ऊँचे लकड़ी के परदे वनस्पति पदार्थ और मधुमक्खी के मोम के मिश्रण से लगे होते हैं, और दरबार संस्था का पन्ना धातु के परदों का उल्लेख करता है।
आकार और परदों की संख्या दौर और निर्माता के साथ बदलती है। बर्लिन में एथ्नोलॉजिशेस म्यूज़ियम का VII c 300, जो उत्तर भारत से है और 1982 में आया, अपनी सबसे लंबी जगह पर 141 cm का है और लगभग 3.5 kg का है। उसका VII c 664, जो कलकत्ता से है और 1995 में आया, 153 cm का है और लगभग 4 kg का है। हॉर्निमन म्यूज़ियम कलकत्ता के कनाईलाल एंड ब्रदर के बनाए अपने वाद्य को लगभग 1960 से 1980 के बीच का मानता है। उसमें सागौन की नली और 23 परदे हैं।
मींड: परदे पर तार को बगल में खींचना
रुद्र वीणा वादक मींड, यानी स्वरों के बीच फिसलन, दबाए गए तार को उसके परदे पर गर्दन के निचले किनारे की ओर बगल में खींचकर बनाते हैं। उँगली उसी एक परदे पर रहती है। परदा वह स्वर देता है जहाँ से फिसलन शुरू होती है, और खींच की लंबाई तय करती है कि स्वर कितना ऊपर चढ़ेगा। गहरी खींच ध्वनि का रंग भी बदलती है।
यह फिसलन ध्रुपद गायन से आती है, जहाँ गायक आवाज़ से यही गति करते हैं। धीमी मींड दो स्वरों, पूरे सप्तक या उससे ज़्यादा तक फैल सकती है, और तेज़ गति में वह एक ही स्वर-वाक्य के भीतर चढ़कर लौट सकती है। लंबाई जो भी हो, मींड को ठीक स्वरों से शुरू होकर ठीक स्वरों पर उतरना होता है, और वादक को जानना होता है कि वह राग के किन स्वरों को पार करती है। इसीलिए रुद्र वीणा पर अभ्यास स्वर-क्रम के उन अभ्यासों से शुरू होता है जो तार खींचने के लिए उँगलियों की ताक़त बनाते हैं।
छेड़, गूँज और फिसलन
दाहिना हाथ धातु के मिज़राबों से छेड़ता है। 1991 में लिखते हुए फिलिप ब्रुगिएर ने चार स्वर-तारों के लिए तर्जनी और मध्यमा पर दो मिज़राबों का वर्णन किया। दाहिनी छोटी उँगली लय के दो तारों, चिकारी, पर प्रहार करती है, और बाईं छोटी उँगली आधार-स्वर का एक तार छेड़ती है। सबसे ऊँचा और सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला स्वर-तार डाँड के बाएँ किनारे पर रहता है। वहाँ उसे चौड़ी फिसलन के लिए परदे की पूरी चौड़ाई तक खींचा जा सकता है, और वह चिकारी के बगल में रहता है, इसलिए दाहिने हाथ की एक छोटी गति स्वर और लय दोनों एक साथ बजा सकती है।
बहाउद्दीन डागर अपने प्रहारों को ध्रुपद गायन के अक्षरों के अनुसार गढ़ते हैं, ताकि हर स्वर-वाक्य सही जगह कटे, और कहते हैं कि वे जो बजाते हैं उसका कम से कम 95 प्रतिशत गा सकते हैं। गमक, यानी ध्रुपद गायन में स्वर का ज़ोरदार आंदोलन, पर वादक एकमत नहीं हैं। बहाउद्दीन डागर इसे उन गायन तकनीकों में गिनते हैं जो वीणा नहीं बना सकती, जबकि रुद्र वीणा बजाने और बनाने वाले कार्स्टन विके के अनुसार वीणा वादन इसे ध्रुपद गायन से लेता है।
महारत की यात्रा
इस विधा में महारत के लिए इस सुनियोजित यात्रा का पालन करें
टिकाव और साफ़ छेड़ तय करें
मींड के दोनों सिरे सुनें
स्वर-वाक्य में छेड़ों की जगह तय करें
धड़कन पहचानें और बनाए रखें
समय पर रचना में लौटें
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