मूल श्रेणी हिंदुस्तानी शास्त्रीय
हिंदुस्तानी शास्त्रीय वाद्य संगीत उत्तर भारत का राग संगीत है, जो सितार, सरोद, सारंगी, बांसुरी और तबला जैसे वाद्यों पर बजता है, और हर वाद्य की अपनी तकनीक है।
ऐतिहासिक समयरेखा
सितार किसने विकसित किया, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं, और यहाँ पढ़ा गया कोई भी स्रोत किसी एक आविष्कारक का समर्थन नहीं करता। लोकप्रिय मान्यता इसका श्रेय कवि अमीर खुसरो (1253 से 1325) को देती है, पर सितार शब्द उनकी रचनाओं में नहीं आता, और उनकी मृत्यु के तीन सदियों से भी ज़्यादा समय तक कोई लिखित या चित्रित स्रोत यह वाद्य नहीं दिखाता। बाद के मौखिक स्रोत 18वीं सदी के एक संगीतकार, खुसरो खान, का नाम लेते हैं। यह नाम फ़ारसी के उन शब्दों से आया है जिनका अर्थ है ‘तीन तार’। इतिहासकार एलिन माइनर का सतर्क निष्कर्ष है कि सितार 18वीं सदी के पूर्वार्ध में उत्तर-पश्चिम से दिल्ली पहुँचा और फ़ारसी तथा मध्य एशियाई सेतार से विकसित हुआ।
भारतीय संगीतकारों ने सेतार की गर्दन चौड़ी और लंबी की, रेशम के परदों की जगह उभरी हुई धातु की छड़ें लगाईं और एक सपाट, चौकी जैसी घुड़च लगाई। ये विशेषताएँ बीन, यानी रुद्र वीणा, से ली गईं। पहले गायन और नृत्य की संगत का वाद्य रहा सितार बीन की तकनीक अपनाकर प्रमुख एकल वाद्य के रूप में बीन की जगह ले बैठा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद रेडियो, रिकॉर्डिंग और हवाई यात्रा सितार को यूरोप और अमेरिका ले गए, और रवि शंकर ने 1950 के दशक में अंतरराष्ट्रीय दौरे शुरू किए।
मुरक्का-ए-देहली का वृत्तांत
मुरक्का-ए-देहली, जो 1738 की दिल्ली पर दरगाह कुली खान का फ़ारसी वृत्तांत है, एक सितार वादक को बीन वादक नियामत खान ‘सदारंग’ का भाई बताता है। यह इस वाद्य का सबसे पुराना ज्ञात लिखित उल्लेख है।
मसीतखानी गत का भंडार
मसीतखानी गतें सितार की धीमी रचनाएँ हैं, जो 18वीं सदी के उत्तरार्ध के दिल्ली के संगीतकार मसीत खान से जुड़ी हैं। माइनर के अनुसार सितार की पहली एकल शैली का श्रेय उन्हें जाता है। बाद में जयपुर और राजस्थान के दूसरे हिस्सों के संगीतकारों ने इस शैली को विकसित किया।
लखनऊ का सुर प्यार
सुर प्यार, जो 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लखनऊ में बना, एक ही वाद्य में सितार, तंबूरा और इसराज को जोड़ता है। इसके आविष्कारकों ने इसका नाम सुर प्यार, यानी ‘प्यारी ध्वनि’, रखा। इसराज वाले हिस्से में तरब के तार हैं, सितार वाले हिस्से में नहीं।
इमदाद खान की ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग
इतिहासकार एलिन माइनर के अनुसार ग्रामोफ़ोन कंपनी ने 1905 में इमदाद खान (लगभग 1848 से 1920) को रिकॉर्ड किया, जो डिस्क पर आने वाले शुरुआती सितार वादकों में से एक थे।
मुरारी अधिकारी का कलकत्ता सितार
मुरारी अधिकारी ने 1997 में यह सितार बनाया, जिसमें सात बजाने के तार और तेरह तरब के तार हैं। इसे रखने वाला मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट इसकी पुरानी शैली की ओर ध्यान दिलाता है, जो 20वीं सदी की शुरुआत में लोकप्रिय थी और जिसमें तारों के नीचे एक ध्वनि-छिद्र होता है।
वादन तकनीकें
तार, घुड़च और जवारी
भिनभिनाती ध्वनि मुख्य घुड़च से आती है: कंपन करते समय तार उसकी चौड़ी, हल्की घुमावदार सतह को छूते हैं, और यही स्पर्श, जिसे जवारी कहते हैं, ध्वनि के रंग और गूँज की अवधि को गढ़ता है। वादक एक मुख्य स्वर-तार और आधार-स्वर के तार छेड़ते हैं, जिनमें ऊँचा चिकारी तार भी है। परदों के नीचे लगे तरब के तार छेड़े बिना, बस साथ बजते स्वरों से गूँज उठते हैं।
मिज़राब का प्रहार
मिज़राब तार का बना प्लेक्ट्रम है, जो दाहिनी तर्जनी पर पहना जाता है। बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा मुख्य तार को परदों पर दबाती हैं। एक शिक्षण पद्धति प्रहारों को दा (अंदर की ओर) और रा (बाहर की ओर) कहती है, जो मिलकर दिर और रदा बनते हैं। इनके क्रम तबले के चक्र के साथ खेलते हैं।
परदे और मींड
परदे गर्दन पर बँधी घुमावदार धातु की छड़ें हैं, जिन्हें हर राग के हिसाब से खिसकाया जा सकता है। मींड में वादक एक ही परदे पर तार को एक ओर खींचते हैं, जिससे स्वर एक निरंतर फिसलन में ऊपर उठता है। घसीट में उँगली एक ही प्रहार के भीतर डाँड पर फिसलती है।
चिकारी, जोड़ और झाला
चिकारी के प्रहार आलाप, जोड़ और झाला में बदलते हैं। आलाप में वादक दोनों चिकारी तारों को एक और तार के साथ झंकारते हैं, जिससे तानपुरे जैसी पृष्ठभूमि बनती है। झाला में स्वर-तार और चिकारी के प्रहार तेज़ी से बारी-बारी आते हैं।
महारत की यात्रा
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मुद्रा, मिज़राब और पहले प्रहार
सरगम और हाथों का तालमेल
राग के स्वर-वाक्य और मींड
गत और ताल
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