मूल श्रेणी हिंदुस्तानी शास्त्रीय
हिंदुस्तानी शास्त्रीय वाद्य संगीत उत्तर भारत का राग संगीत है, जो सितार, सरोद, सारंगी, बांसुरी और तबला जैसे वाद्यों पर बजता है, और हर वाद्य की अपनी तकनीक है।
ऐतिहासिक समयरेखा
एन. राजम ने अपने पिता ए. नारायण अय्यर से वायलिन सीखा और मुसिरी सुब्रमण्य अय्यर से कर्नाटक संगीत पढ़ा, फिर ग्वालियर घराने के ओंकारनाथ ठाकुर से हिंदुस्तानी संगीत की तालीम ली। वे 1959 में वाराणसी आ गईं और लगभग चार दशक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। संगीत नाटक अकादेमी वायलिन पर गायकी अंग को उनकी विशेषता बताती है और इसके लिए गज और उँगलियों की एक तकनीक का श्रेय उन्हें देती है।
राजम ने अपनी बेटी संगीता शंकर को सिखाया, जिन्होंने अपनी बेटियों रागिनी और नंदिनी शंकर को सिखाया। राजम की भतीजी या भांजी कला रामनाथ ने लगभग दो साल की उम्र में अपने दादा या नाना ए. नारायण अय्यर से शुरुआत की, और बाद में राजम और गायक जसराज से तालीम ली। नवंबर 2021 में जिनेवा के आतेलिए द’एथ्नोम्यूज़िकोलॉजी ने संगीता, रागिनी और नंदिनी शंकर का एक कॉन्सर्ट और गुरु से शिष्य तक, परिवारों के भीतर भी, ज्ञान के हस्तांतरण पर एक सार्वजनिक चर्चा आयोजित की।
कुछ रास्ते पारिवारिक परंपरा से बाहर भी गए। औंध दरबार में कोई शिक्षक उपलब्ध न होने पर गजाननराव जोशी ने ग्वालियर गायकी से अपनी वायलिन तकनीक गढ़ी। राजस्थान विश्वविद्यालय की वायलिन डिग्री आज सिद्धांत के रूप में गुरु-शिष्य परंपरा और संस्थानों में संगीत शिक्षा पढ़ाती है।
गजाननराव जोशी को अकादेमी पुरस्कार
संगीत नाटक अकादेमी ने 1972 में हिंदुस्तानी वाद्य संगीत का अपना पुरस्कार गजाननराव जोशी को दिया। उसका प्रशस्ति-पत्र उन्हें हिंदुस्तानी संगीत के अग्रणी वायलिन वादकों में से एक बताता है, जिनका वायलिन मुख्यतः ग्वालियर-आधारित शैली में गाता था।
वी. जी. जोग को अकादेमी पुरस्कार
वी. जी. जोग को 1980 में हिंदुस्तानी वाद्य संगीत के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिला। वे लखनऊ के भातखंडे संगीत संस्थान में पढ़ा चुके थे, आकाशवाणी में संगीत प्रोड्यूसर रह चुके थे और वायलिन की एक पाठ्यपुस्तक, बेहाला शिक्षा, लिख चुके थे।
एन. राजम को अकादेमी पुरस्कार
एन. राजम को 1990 में वायलिन पर हिंदुस्तानी वाद्य संगीत के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार मिला। अकादेमी ने 2012 में उन्हें रत्न सदस्य चुना, और भारत सरकार ने 2026 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वायलिन और तबला प्रस्तुति
30 अक्टूबर 2019 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने हिंदुस्तानी वायलिन पर रागिनी शंकर को तबले पर अभिषेक मिश्र के साथ प्रस्तुत किया। उनकी बैठक प्रस्तुति, यानी छोटी महफ़िल वाला घरेलू प्रारूप, में राग देस शामिल था, और समापन राग मिश्र खमाज में वैष्णव जन तो से हुआ।
वायलिन आवेदकों के लिए एनसीपीए का आमंत्रण
मुंबई का नेशनल सेंटर फ़ॉर द परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स 2009 से हिंदुस्तानी संगीत की उन्नत तालीम के लिए धन देता रहा है, और उसके 2016-17 के छात्रवृत्ति-धारकों में वायलिन वादक अनूप कुलथे का नाम था। 2024-26 की योजना के लिए उसके आमंत्रण में, जो 10 जनवरी 2024 को बंद हुआ, वायलिन पात्र वाद्यों में शामिल था।
वादन तकनीकें
मींड: उँगली बदलते हुए जुड़ा हुआ स्वर
गायकी अंग के वादन में वायलिन वादक स्वरों को एक निरंतर रेखा में जोड़ते हैं, अक्सर मींड से, यानी स्वरों के बीच एक चिकनी फिसलन, जो रास्ते में राग के दूसरे स्वरों को छू सकती है। गायन संगीत के साथ वायलिन के मेल के लिए सबसे ज़्यादा दिए जाने वाले कारण हैं इसका विस्तृत स्वर-क्षेत्र और बिना परदों का डाँड, जिनसे वादक स्वर को खुलकर मोड़ सकते हैं।
कला रामनाथ बता चुकी हैं कि उन्होंने अपने गायक गुरु के स्वर-वाक्यों से मेल बिठाने के लिए अपनी उँगलियों का इस्तेमाल स्वर-वाक्य दर स्वर-वाक्य फिर से सीखा, ताकि हर उँगली का बदलाव छिप जाए। उनके वादन पर एक अध्ययन बताता है कि वे अक्सर एक ही उँगली पर धीमी मींड लेती हैं, फिर ऊपरी पोर को चपटा कर देती हैं, ताकि अगली उँगली फिसलन के बीच में ही काम सँभाल ले और हाथ वहीं पहुँचे जहाँ स्वर-वाक्य को उसकी ज़रूरत है।
वही अध्ययन बताता है कि पहले के हिंदुस्तानी वायलिन वादक ज़्यादातर संगतकार के रूप में या गतकारी शैली में, अलग-अलग रखी उँगलियों से बजाते थे। 2014 में एरिजोना विश्वविद्यालय के एक डॉक्टरेट अध्ययन ने इस तकनीक पर प्रकाशित लेखन को कुछ छोटे साक्षात्कारों के अलावा लगभग नदारद बताया।
स्वर-वाक्य के पीछे चलता गज
गायकी अंग के वादन में गज अक्सर बंदिश के बोलों के पीछे चलता है, यानी बोलों वाला रचा हुआ ख़याल गीत। ऊपर उद्धृत कला रामनाथ के वादन का अध्ययन बताता है कि वे गज के बदलावों को रचना के अक्षरों से मिलाती हैं, ताकि हर दिशा-बदलाव में धुन बनी रहे, और वे जो रचनाएँ बजाती हैं उन्हें गा भी सकती हैं। एक साक्षात्कार में वे बताती हैं कि वे स्वर-वाक्य के बीच गज की दिशा के बदलाव को सुनाई न देने लायक बनाने पर काम करती हैं।
उपज वाले अंशों का गज अलग होता है। वही अध्ययन सरगम तानों का वर्णन करता है, यानी स्वर-नामों पर तेज़ दौड़, जो हर स्वर के लिए अलग प्रहार से बजती हैं। बोलतान, यानी रचना के बोलों पर दौड़, गज की लय में उभरती है। तराना के लिए, जो निरर्थक अक्षरों पर गाया जाने वाला गीत-रूप है, वे स्पिकातो, यानी उछलता हुआ प्रहार, इस्तेमाल करती हैं। अध्ययन इन्हें एक कलाकार के समाधानों के रूप में रखता है।
प्रहार-आधारित शैली गतकारी का राजस्थान विश्वविद्यालय की वायलिन डिग्री में आज भी स्थान है। इसके दूसरे वर्ष के विद्यार्थी गतकारी गज के प्रकारों की परिभाषा देते हैं और तेज़ ख़याल रचनाएँ या गतें तैयार करते हैं।
हिंदुस्तानी संगीत के लिए वायलिन का सुर कैसे मिलाया जाता है
हिंदुस्तानी वायलिन का सुर सा, यानी षड्ज, से शुरू होता है, जिसकी कोई तय ऊँचाई नहीं है। कलाकार आधार-स्वर के साथ अपना सा तय करते हैं और खुले तारों को उसके हिसाब से मिलाते हैं, इसलिए सा बदलने पर पूरा सुर बदल जाता है।
भारतीय वायलिन के सुर-मिलान की पृष्ठभूमि कर्नाटक संगीत में है। बालुस्वामी दीक्षितर को 1800 के आसपास मद्रास के पास कर्नाटक संगीत के लिए वायलिन को ढालने का श्रेय दिया जाता है, जिन्होंने इसे बारी-बारी पंचम और मध्यम के अंतराल पर मिलाया: सबसे ऊँचे तार से प-सा-प-सा, जहाँ प सा से पाँचवाँ स्वर है। हिंदुस्तानी वायलिन पर एक शोध-प्रबंध उनके बदलावों को भारतीय तकनीक का आधार मानता है, और यह भी बताता है कि एक व्यक्ति को दिया गया यह श्रेय एक विवरण से दूसरे विवरण में चली आई परंपरा है। यह इतिहास यह नहीं दिखाता कि आज के हिंदुस्तानी वायलिन वादक अपने वाद्य कैसे तैयार करते हैं।
इस पन्ने के पीछे के स्रोत कोई एक हिंदुस्तानी सुर-मिलान या स्वर-ऊँचाई तय नहीं करते। कला रामनाथ बता चुकी हैं कि दो से तीन घंटे के एकल कॉन्सर्ट के अनुकूल होने के लिए वे वायोला के तार लगाकर A-D-A-D पर सुर मिलाती हैं, जो कई भारतीय वायलिन वादकों के सुर से नीचा है।
महारत की यात्रा
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आधार-स्वर के साथ सा पर सुर मिलाएँ
उँगली बदलते हुए स्वर जोड़ें
रचना और ताल पर गज बिठाएँ
राग के स्वर-वाक्य की तुलना और विकास
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