मूल श्रेणी हिंदुस्तानी शास्त्रीय
हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन उत्तर भारतीय कला संगीत की गायन परंपरा है। गायक ख़याल और ध्रुपद में बंदिश और उपज के सहारे राग का विस्तार करते हैं।
ऐतिहासिक समयरेखा
ज़्यादातर विवरण तराने का रचयिता अमीर खुसरो को बताते हैं। दिल्ली घराना अपना तराना भंडार क़व्वाल बच्चों के ज़रिए, यानी दिल्ली के वंशानुगत क़व्वाल समुदाय के ज़रिए, उन्हीं तक ले जाता है, जिसकी शुरुआत उनके शिष्य सामत बिन इब्राहीम से होती है। इस श्रेय के समर्थक बाद के हिंद-फ़ारसी लेखकों का हवाला देते हैं। पांडे और भारद्वाज (2024) के अनुसार 16वीं सदी के उत्तरार्ध की अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी खुसरो को तराने का रचयिता बताती है, और फकीरुल्लाह का रागदर्पण (1663) उन्हें तराना गायन का श्रेय देता है।
लेखक अभिक मजूमदार का विवरण संदेह के आधार सामने रखता है। अपनी एजाज़-ए-ख़ुसरवी में खुसरो ऐसे रागों के नाम लेते हैं जो उनके अनुसार पहले से मौजूद थे, और इनमें से किसी को अपना नहीं बताते। उद्गम की किंवदंती पर मजूमदार का विवरण 1834 के विलार्ड के ग्रंथ का हवाला देता है। उस कथा में खुसरो गोपाल नायक को राग कदंबक गाते सुनते हैं और उसे निरर्थक अक्षरों पर दोहरा देते हैं, और आधुनिक लेखक इसे किंवदंती मानते हैं। फिर भी मजूमदार के अनुसार इस रूप के उभरने में खुसरो की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
बाद के घरानों में रामपुर-सहसवान घराना तराने के लिए जाना जाता है। संगीत नाटक अकादेमी ने निसार हुसैन खान को दिए अपने पुरस्कार में इस रूप की उनकी निपुण प्रस्तुति को मान्यता दी।
श्रेय अमीर खुसरो को
दिल्ली सल्तनत के दरबार के कवि और संगीतकार अमीर खुसरो (1253 से 1325) तराने के पारंपरिक रचयिता हैं। इस श्रेय के दोनों पक्षों के लेखक तराने को निर्गीत पर आधारित मानते हैं, यानी बिना शब्दों का वह गायन जो उनसे पहले भारत में मौजूद था।
रामपुर दरबार के तराने
रामपुर दरबार में बहादुर हुसैन और वजीर खान जैसे सेनिया ध्रुपद संगीतकारों ने बड़ी संख्या में तराने रचे। मैहर घराने के गुरुओं ने बाद में दर्जनों तेज़ सरोद रचनाएँ (द्रुत गतें) जुटाईं, जिन्हें रामपुर के तरानों पर आधारित बताया जाता है।
रिकॉर्डिंग का दौर
तराना 78 rpm डिस्कों तक पहुँचा, जिनमें रामपुर-सहसवान घराने के निसार हुसैन खान के द्रुत तराने भी हैं। इंदौर घराने के संस्थापक अमीर खान (1912 से 1974) ने 1958 से तराने पर शोध किया और 1966 में इसकी शैली पर लेख प्रकाशित किया।
आज का चलन
निसार हुसैन खान के शिष्य राशिद खान (1968 से 2024) ने रामपुर-सहसवान परंपरा में तराने गाए। हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीतकारों को साथ लाने वाली मंडलियों में भी तराने आते हैं, जैसे राग कीरवाणी में रवि शंकर का तराना।
वादन तकनीकें
लयात्मक अक्षर
तराना अक्षरों के एक भंडार पर टिका है: ता, ना, दिर (dere या dare भी), तोम, दानी, ओदानी, तदीम और ताना, और कुछ रचनाओं में याली और अली-अल्ला। कई तराने बोलों का सहारा लेते हैं, यानी किसी वाद्य के प्रहारों का नाम लेने वाले बोले जाने वाले अक्षर: धा, तिरकिट और धुम जैसे पखावज और तबले के बोल, दिर दिर जैसी प्रहार-ध्वनियाँ और, कुछ विवरणों के अनुसार, सितार के बोल।
इन अक्षरों का अर्थ क्या है, इस पर विवाद है। एक मत के अनुसार इनका कोई शब्दकोशीय अर्थ नहीं है और इन्हें ध्वनि और अनुप्रास के लिए चुना जाता है। अमीर खान ने तर्क दिया कि ये फ़ारसी और अरबी शब्द हैं जिनका अर्थ दोहराव में खो गया, और उन्होंने दानी को ‘वह जानता है’ और याला को ‘या अल्लाह’ पढ़ा। प्रभा अत्रे के हवाले से बताया जाता है कि तराना अर्थ वाले शब्दों से शुरू हुआ, जिनका बाद के गायकों ने ग़लत उच्चारण किया। दूसरे संगीतकारों के अनुसार एक फ़ारसी आधार था जो अब खो चुका है।
तराना शब्द एक तकनीक का नाम भी है। संगीतकार कभी-कभी ख़याल और ध्रुपद के नोम-तोम अंशों को, जो नोम, तोम और ता-रा-ना जैसे अक्षरों पर गाए जाते हैं, तराना कहते हैं। वे अंश दूसरे रूपों का विस्तार करते हैं, जबकि रचा हुआ तराना अपने आप में एक रचना है।
बनावट और प्रकार
ख़याल की तरह तराने के भी दो हिस्से होते हैं: स्थायी, यानी पहला हिस्सा, और अंतरा, यानी दूसरा। फ़ारसी शेर या रुबाई वाला तराना, जिसमें यह छंद आम तौर पर अंतरे में आता है, रुबाईदार तराना कहलाता है। ऐसे छंदों में कभी-कभी फ़ारसी के बीच उर्दू, हिंदी या संस्कृत की पंक्तियाँ भी होती हैं।
दिल्ली घराने से बताया गया एक वर्गीकरण तीन प्रकार गिनाता है: केवल अक्षरों पर तराना, ऐसा तराना जिसके अंतरे में छंद जुड़ता है, और त्रिवट, जिसका स्थायी तराने के अक्षरों का इस्तेमाल करता है जबकि अंतरा ताल-वाद्य के बोलों पर चला जाता है। यह वर्गीकरण उसी घराने की परंपरा का है, और दूसरे घराने तरानों को अलग तरह से बाँट सकते हैं।
लय और ताल
तराना सबसे ज़्यादा द्रुत लय में गाया जाता है, हालाँकि तराने अलग-अलग तालों और लयों में बँधे होते हैं। दर्ज उदाहरण तीनताल (16 मात्राएँ) और एकताल (12 मात्राएँ) में हैं। कुछ मध्य लय में शुरू होकर द्रुत तक तेज़ होते हैं। एकताल में राग गौड़ सारंग में राशिद खान का तराना इसी चाप पर चलता है।
एक धीमा रूप, ख़यालनुमा, अब कम ही सुनाई देता है। फ़िल्म्स डिवीज़न के लिए बनी रजत कपूर की 1995 की फ़िल्म तराना में राग यमन का एक ख़यालनुमा जाल बलपोरिया की आवाज़ में है।
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ख़याल की बुनियाद
बोलों की शब्दावली
ताल और लय
भंडार
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